बदायूँ: जन्मदिवस विशेष ६ जुलाई/संवेदनाओं के कवि डॉ उर्मिलेश

बदायूँ: डॉ उर्मिलेश कुमार शंखधार हिंदी साहित्य का चिरपरिचित नाम हैं ! बदायूँ (उत्तर प्रदेश)के क़स्बे इस्लामनगर में ६ जुलाई १९५१ जन्मे डॉ उर्मिलेश हिंदी गीतों के पर्यायवाची हैं। सामाजिक विसंगतियों,रिश्तों,देश भक्ति,प्रेम,सौहार्द,समरसता,भक्ति,जाग्रति,एकता,मानवीय संवेदना जीवन दर्शन आदि अनेकों पहलुओं को उन्होंने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है। हिंदी काव्य मंचों पर अपने व्यक्तित्व और ओजपूर्ण रचनाओं से श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर हिंदी की सेवा करने वाले डॉ उर्मिलेश बदायूँ नेहरू मेमोरियल शिव नारायण दास महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक एवं विभाध्यक्ष रहे, उनके अनेक शिष्य आज विभिन्न क्षेत्रों में नगर का नाम प्रसिद्ध का रहे हैं।
उनकी प्रसिद्ध कविता
चाहें ज़िंदा रहें चाहें मर जाएँ हम
गायेंगे गायेंगे हम वंदे मातरम्
आज भी पूरे देश के काव्यप्रेमियों की ज़ुबान पर है !
बेवजह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिये
ज़िन्दगी जंग है इस जंग को जारी रखिये
सकारात्मकता से लबरेज़ डॉ उर्मिलेश की इस ग़ज़ल ने लोगों को जीने का तरीक़ा सिखलाया है! डॉ उर्मिलेश काव्य की हर विधा में सामान रूप से पारंगत थे!दोहे,ग़ज़ल,मुक्तक,गीत,नवगीत इत्यादि !
सैकड़ों सम्मानों से सम्मानित डॉ उर्मिलेश को मरणोपरांत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘यश भारती’ सम्मान से सम्मानित किया गया! उनका विस्तृत साहित्य रहा है जिसमे मुख्य रूप से गीत, ग़ज़ल, कविता, मुक्तक विधाओं में
प्रकाशित प्रमुख संग्रह पहचान और परख, सोत नदी बहती है, चिंरजीव हैं हम, बाढ़ में डूबी नदी (सभी गीत-संग्रह); धुआँ चीरते हुए, जागरण की देहरी पर, बिम्ब कुछ उभरते हैं (दोनों नवगीत-संग्रह); घर बुनते अक्षर, फ़ैसला वो भी ग़लत था, धूप निकलेगी, आइनें आह भरते हैं (सभी ग़ज़ल-संग्रह); गंधो की जागीर, वरदानों की पाण्डुलिपि (दोहा-संग्रह), अक्षत युगमान के (कविता संग्रह) एवं एक ऑडियो सी डी ज़िन्दगी से जंग है. बदायूं क्लब एवं बदायूं महोत्सव जैसी संस्थाओं को राष्ट्रिय स्तर पर पहचान दिलाने में डॉ उर्मिलेश का योगदान अप्रतिम है. आज भी उनकी कविताएं जनमानस के मन मस्तिक्ष में गूंजती है. उनके कुछ प्रमुख शेर बहुत प्रसिद्ध रहे जैसे तू इन बूढ़े दरख्तों की हवाएँ साथ रख लेना
सफ़र में काम आयेंगी दुआएँ साथ रख लेना

हँसी बच्चो की, माँ का प्यार और मुस्कान बीबी की
तू घर से जब चले तो दवाएँ साथ रख लेना

तू जला वो भी ग़लत था, मैं जला ये भी ग़लत
हौसला वो भी ग़लत था, हौसला ये भी ग़लत

उसने मन्दिर तोड़ डाला तूने मस्जिद तोड़ दी
जलजला वो भी ग़लत था, जलजला ये भी ग़लत

पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे
जो सही है वो बात बोलेंगे

साहिबो, हम कलम के बेटे हैं
कैसे हम दिन को रात बोलेंगें

अब बुजर्गौ के फ़साने नहीं अच्छे लगते
मेरे बच्चों को ये ताने नहीं अच्छे लगते

बेटियाँ जबसे बड़ी होने लगी हैं मेरी
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते
उन्हें याद करते हुए प्रसिद्ध हास्य कवी सुरेन्द्र शर्मा कहते हैं “उर्मिलेश हर पायदान पर काव्यपाठ पर सिद्ध हस्त थे ।वो जितने अच्छे गीतकार थे उतने ही अच्छे ग़ज़लकार थे।देश में घटने वाली हर मह्त्वपूर्ण घटना पर घटना पर उनकी क़लम से कुछ न कुछ नया निकल आता था ।मंच पर और साहित्य में उर्मिलेश की कमी सदैव ही महसूस की जाती रहेगी”
गीतकार डॉ कुंवर बेचैन कहते हैं “डॉ. उर्मिलेश की रसपूर्ण एवम् धारदार ग़ज़लें कमल की पाँखुरी पर तलवार का पानी है !”
पद्मश्री गोपाल दास नीरज के अनुसार “डॉ.उर्मिलेश ने गीत और ग़ज़ल के क्षेत्र में जो कम् किया है ,वह देश की उपलब्धि है!”
प्रसिद्ध कवी कमलेश्वर के अनुसार “‘काव्या’ के माध्यम से मैं तुम्हारे दोहों से परिचित हुआ हूँ! तुम्हारी दृष्टि और काव्यात्मक सृजनशीलता से मैं चमत्कृत हूँ
! ” आज भले ही डॉ उर्मिलेश इस संसार में नहीं है लेकिन उनकी स्मृति बदायूं वासियों, साहित्यप्रेमियों के मन में सदैव रहेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *