मुरादाबाद:किसान की बेटी ने किया कुन्दरकी का नाम रोशन (रिपोर्टर हिलाल अकबर बिलारी)

मुरादाबाद: कुन्दरकी  के किसान स्वर्गीय काजी अफरोज अहमद ने अपना पूरा जीवन खेत-खलिहानों में काटा, मगर 25 वर्षीय बेटी इल्मा अफरोज़ ने लन्दन, पेरिस, न्यूयॉर्क तक जाकर कुन्दरकी का नाम रोशन किया. काजी अफरोज़ अहमद के देहांत के समय इल्मा मात्र 14 वर्ष की थी. घर में बेहद मुश्किल समय में उनकी माता सुहैला परवीन ने इल्मा को हौंसले और हिम्मत से अपनी मंजिल पर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया. स्नातक के लिये दिल्ली के प्रख्यात सैंट स्टीफेंस कॉलेज से शिक्षा बेहेतरीन अंकों से पास की. यहाँ उनको KPMG और मैक्स इंडिया जैसे पुरुस्कारों से नवाज़ा गया. फिर आगे की शिक्षा के लिये पेरिस अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय और इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय ने छात्रवृत्ति प्रदान की. ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय, इंग्लैंड में इल्मा अफरोज़ को प्रतिष्टित IFMR पुरुस्कार एवं कंटेम्पररी साउथ एशियाई स्टडीज अवार्ड मिले. इल्मा ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी यूनाइटेड नेशन एसोसिएशन (OUUNA) की पब्लिसिटी अधिकारी भी रहीं. उनके नाम देशी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में जीते गए सैकड़ों इनाम हैं.
इसके बाद इल्मा ने संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के इंडोनेशिया कार्यालय और फिर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन एवं उनकी पत्नी व अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार रही श्रीमती हिलेरी क्लिंटन द्वारा स्थापित क्लिंटन फाउंडेशन, न्यूयॉर्क शहर, अमेरिका में वोलंटरी सर्विस प्रोग्राम पूरा किया.
भारत लौट कर इल्मा ने सिविल सर्विसेज ज्वाइन करने की ठानी. इस साल IAS की परीक्षा के प्रेलिम्स में सफलता हासिल की. पिछले हफ्ते मुख्य इम्तेहान की परीक्षा पूर्ण हुई. इल्मा के लेख प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं.
कुन्दरकी में तमाम तरह के अभावों के बीच गुज़रा बचपन, मिटटी के तेल के लैंप में ही पढाई की, छोटे से कसबे में रह कर भी इतना ऊँचा सोचने और उसको पूरा कर दिखने की हिम्मत उन्हें अपने किसान पिता काजी अफरोज़ अहमद को खेतों में काम करते हुए देख कर मिली. इल्मा ने हिम्मत से यह साबित किया है की मेहनत और सच्ची लगन से कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं.

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