दिल्ली: उपराष्‍ट्रपति ने मकर संक्रांति और पोंगल के शुभावसर पर देशवासियों को बधाई दी

दिल्ली: उपराष्‍ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने मकर संक्रांति और पोंगल के शुभावसर पर देशवासियों को बधाई दी है। अपने संदेश में उपराष्‍ट्रपति ने कहा है कि यह उत्‍सव देश भर में विभिन्‍न नामों से मनाया जाता है। यह लोगों के जीवन में सकारात्‍मक बदलाव लाने वाला पर्व है।

उपराष्‍ट्रपति के संदेश का मूलपाठ नीचे दिया जा रहा है –

‘पोंगल नल वलथुक्‍कल

मैं मकर संक्रांति और पोंगल के शुभावसर पर अपने देशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। यह फसल की कटाई का उत्‍सव है, जो उत्‍तरायण के आंरभ का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य भगवान को समर्पित है। यह कृतज्ञता प्रकट करने का उत्‍सव है तथा पूरे तमिलनाडु में पारम्‍परिक हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है। मैं समृद्ध और खुशहाली के लिए कामना करता हूं।

देश भर में लोग बहुत उत्‍साह के साथ यह त्‍योहार मनाते हैं। इसे देश भर के विभिन्‍न भागों में भिन्‍न–भिन्‍न नामों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इसे ‘पोंगल’ और ‘मकर संक्रांत’, केरल में ‘विशू’,पंजाब और हरियाणा में ‘लोहड़ी’, असम में ‘बिहू’ और बिहार में ‘खिचड़ी’ कहा जाता है।

इस महत्‍वपूर्ण पर्व की महान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्‍ता है, क्‍योंकि सूर्य भगवान को प्राय: अलौकिकता और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

इस शुभावसर पर हम अपनी जड़ों की तरफ लौटने और अपनी गौरवशाली संस्‍कृति, परम्‍परा, परिपाटी, कला और उत्‍सवों को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध हों।

उत्‍सव पुनर्जागरण, नवीनीकरण और पुनर्चेतना का प्रतीक होते हैं। वे आज के व्‍यस्‍त समय में एकता, प्रेम और भाईचारे की भावना पैदा करते हैं। इस अवसर पर परिवार और समुदाय एक साथ मिलते हैं तथा यह सामाजिक जुड़ाव का महान अवसर होता है।

आइये हम सब भारत की परम्‍पराओं और रिवाज़ों को प्रोत्‍साहन देकर देश में सांस्‍कृतिक पुनर्जागरण के लिए प्रतिबद्ध हों।

समय आ गया है कि सभी भारतीय अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं और स्‍वस्‍थ जीवन की अपनी प्राचीन पारम्‍परिक शैली की तरफ लौटें। आवश्‍यकता है कि हम अपने पुरखों की परम्‍पराओं और रिवाजों का अनुसरण करें और पश्चिमी जीवन शैली का त्‍याग करें।

हमारी पारम्‍परिक खान-पान, परम्‍परा और हमारी परिपाटी न सिर्फ स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक है, बल्कि वह हर मौसम और क्षेत्र की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखकर तैयार की गई है।

हमें आवश्‍यकता है कि हम युवाओं को स्‍वस्‍थ खान-पान की आदत डालने के लिए प्रोत्‍साहित करें और उन्‍हें अपनी सादगी भरी जीवन शैली की तरफ लौटने के लिए प्रेरित करें। इसी तरह योग की प्राचीन भारतीय कला स्‍वस्‍थ मस्तिष्‍क और स्‍वस्‍थ शरीर के बीच गहरा संबंध स्‍थापित करती है।

मैं युवाओं से अपील करता हूं कि वे कृषि की तरफ ध्‍यान देना शुरू करें, जो भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ है। समय आ गया है कि हम प्राकृतिक खेती के तरीकों को ज्‍यादा महत्‍व दें और रासायनिक उर्वरकों के इस्‍तेमाल को कम करें।

सबको अपनी मातृ भाषा की सुरक्षा, प्रोत्‍साहन और प्रचार का प्रयास करना चाहिए।

पारम्‍परिक पारिवारिक प्रणाली भारत का गौरव हुआ करती थी। आवश्‍यकता है कि पारिवारिक मूल्‍यों की रक्षा की जाए। हमारी परम्‍पराएं और हमारे रिवाज़ न केवल सामाजिक संरचना को मजबूती प्रदान करते हैं, बल्कि वे विभिन्‍न वर्गों के बीच जुड़ाव भी पैदा करते हैं।

भारतीय हमेशा प्रकृति की उपासना, एक दूसरे की सेवा और एक दूसरे के साथ चीजों को साझा करने के दर्शन में विश्‍वास करते हैं। संक्रांति के अवसर पर हम सब स्‍वस्‍थ, मजबूत, समृद्ध और समावेशी भारत निर्मित करने के लिए अपने आपको समर्पित करें।’

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